Tuesday, May 22, 2012


संग्रह: पंचवटी

चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में,
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में।
पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से,
मानों झीम रहे हैं तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से॥

पंचवटी की छाया में है, सुन्दर पर्ण-कुटीर बना,
जिसके सम्मुख स्वच्छ शिला पर, धीर वीर निर्भीकमना,
जाग रहा यह कौन धनुर्धर, जब कि भुवन भर सोता है?
भोगी कुसुमायुध योगी-सा, बना दृष्टिगत होता है॥

किस व्रत में है व्रती वीर यह, निद्रा का यों त्याग किये,
राजभोग्य के योग्य विपिन में, बैठा आज विराग लिये।
बना हुआ है प्रहरी जिसका, उस कुटीर में क्या धन है,
जिसकी रक्षा में रत इसका, तन है, मन है, जीवन है!

मर्त्यलोक-मालिन्य मेटने, स्वामि-संग जो आई है,
तीन लोक की लक्ष्मी ने यह, कुटी आज अपनाई है।
वीर-वंश की लाज यही है, फिर क्यों वीर न हो प्रहरी,
विजन देश है निशा शेष है, निशाचरी माया ठहरी॥

कोई पास न रहने पर भी, जन-मन मौन नहीं रहता;
आप आपकी सुनता है वह, आप आपसे है कहता।
बीच-बीच मे इधर-उधर निज दृष्टि डालकर मोदमयी,
मन ही मन बातें करता है, धीर धनुर्धर नई नई-

क्या ही स्वच्छ चाँदनी है यह, है क्या ही निस्तब्ध निशा;
है स्वच्छन्द-सुमंद गंधवह, निरानंद है कौन दिशा?
बंद नहीं, अब भी चलते हैं, नियति-नटी के कार्य-कलाप,
पर कितने एकान्त भाव से, कितने शांत और चुपचाप!

है बिखेर देती वसुंधरा, मोती, सबके सोने पर,
रवि बटोर लेता है उनको, सदा सवेरा होने पर।
और विरामदायिनी अपनी, संध्या को दे जाता है,
शून्य श्याम-तनु जिससे उसका, नया रूप झलकाता है।

सरल तरल जिन तुहिन कणों से, हँसती हर्षित होती है,
अति आत्मीया प्रकृति हमारे, साथ उन्हींसे रोती है!
अनजानी भूलों पर भी वह, अदय दण्ड तो देती है,
पर बूढों को भी बच्चों-सा, सदय भाव से सेती है॥

तेरह वर्ष व्यतीत हो चुके, पर है मानो कल की बात,
वन को आते देख हमें जब, आर्त्त अचेत हुए थे तात।
अब वह समय निकट ही है जब, अवधि पूर्ण होगी वन की।
किन्तु प्राप्ति होगी इस जन को, इससे बढ़कर किस धन की!

और आर्य को, राज्य-भार तो, वे प्रजार्थ ही धारेंगे,
व्यस्त रहेंगे, हम सब को भी, मानो विवश विसारेंगे।
कर विचार लोकोपकार का, हमें न इससे होगा शोक;
पर अपना हित आप नहीं क्या, कर सकता है यह नरलोक!


नर हो, न निराश करो मन को
- मैथिलि शरण गुप्त

कुछ काम करो, कुछ काम करो
जग में रह कर कुछ नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो, न निराश करो मन को

संभलों कि सुयोग न जाय चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलंबन को
नर हो, न निराश करो मन को

जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को

निज़ गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
मरणोंत्‍तर गुंजित गान रहे
सब जाय अभी पर मान रहे
कुछ हो न तज़ो निज साधन को
नर हो, न निराश करो मन को

प्रभु ने तुमको दान किए
सब वांछित वस्तु विधान किए
तुम प्राप्‍त करो उनको न अहो
फिर है यह किसका दोष कहो
समझो न अलभ्य किसी धन को
नर हो, न निराश करो मन को

किस गौरव के तुम योग्य नहीं
कब कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं
जान हो तुम भी जगदीश्वर के
सब है जिसके अपने घर के
फिर दुर्लभ क्या उसके जन को
नर हो, न निराश करो मन को

करके विधि वाद न खेद करो
निज़ लक्ष्य निरन्तर भेद करो
बनता बस उद्‌यम ही विधि है
मिलती जिससे सुख की निधि है
समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को
नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो

Sunday, January 15, 2012

हम जब घर में खाना खा रहे होते है तो हम घर में होटल जैसा स्वाद और सर्व करने का  तरीका प्राप्त करने का प्रयास करते है और जब होटल में खाना खाना हो तो इसी होटल ढूंढते है जहा घर जैसा खाना और घर जैसी साफ़ सफाई रहती हो .............. दोनों ही परिस्थितियों का एक जगह पर सुमेल होना लगभग असंभव है ! क्योंकि घर में होटल जैसी ओपचारिकता नहीं हो सकती है और होटल में घर की गृहिणी के हाथो की मिठास खाने नहीं हो सकती है ! दोनों को मिलाने के अंतर्द्वंद में हम खाने का सही स्वाद न यहाँ ले पाते है  न वहा ..........  
हा एक बात जरूर है की यदि हम होटल में जहा खाना बन रहा होता है वह जगह जाकर देख कर खाना खाने बैठे और हमारे अन्दर जरा सी भी सम्वेंदन शीलता होगी तो होटल में खाना तुरंत छोड़ देंगे........... 

Tuesday, January 10, 2012

ये महा महोत्सव पंचकल्याणक आया मंगलकारी..............


ये महा महोत्सव पंचकल्याणक आया मंगलकारी..............
ये महा महोत्सव ...................................


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ये महा महोत्सव पंचकल्याणक आया मंगलकारी..............
ये महा महोत्सव ...................................

है धन्य धन्य वे कहान गुरु जिनवर महिमा बतलाते है
वे रंग राग से भिन्न  चिदातम का संगीत सुनाते है
है भव्य जीव आयो सब जन ......... अब मोह भाव का त्याग करो ........
यह पंचकल्याणक उत्सव कर .........अब आतम का कल्याण करो........
ये महा महोत्सव पंचकल्याणक आया मंगलकारी..............
ये महा महोत्सव ...................................

Friday, January 6, 2012

""एक बार वन्दे जो कोई ! ताहि नरक पशु गति नहीं होई!! "

""एक बार वन्दे जो कोई !
 ताहि नरक पशु गति नहीं होई!! "
तीर्थराज सम्मेद शिखर की महिमा को मंडित करने वाला घ्यानत राय जी का यह छंद तीर्थराज की  वंदना के फल को व्यक्त करता है की  तीर्थराज की एक बार भाव सहित वंदना करने से नरक और पशु गति का नवीन आयु  बंध  नहीं होता है | दुर्गतियो में नहीं जाना पड़ता है | यद्यपि  भाव सहित वंदना होने पर ही वंदना की सार्थकता  सफलता निहित है !
परन्तु एक परम तीर्थ .......... तीर्थो का राजा ..........तीर्थो का निर्माता  है जिसकी एक बार यदि वंदना कर ली तो नरक और पशु गति तो क्या गतियो का कुचक्र से छुटकारा मिल सकता है ! वह तीर्थ राज तीर्थ शिरोमणि है निज भगवान आत्मा जिसकी एक बार करी गयी वंदना भव  भव का जन्म मरण का विनाश कर देती है ! एक बार करी गयी वंदना अर्थात  सम्यक्दर्शन जो परिपूर्ण दशा प्राप्त करने की प्रथम सीढ़ी है ! ऐसे तीर्थ शिरोमणि तीर्थ राज की वंदना स्वयं को तीर्थस्वरूप बना देती है |



Wednesday, January 4, 2012

मेरी अनुभूतियाँ

अपने जीवन के खट्टे मीठे अनुभवों को इन्टरनेट के इस जाल प् र सुरक्षित करने के मन से यहाँ ब्लोगिंग की शुरुआत कर रहा हु | वेसे में अपने काम के काम  में एकदम panctual  नहीं हूँ फिर भी यहाँ कौन देखने आ रहा है | जब टाइम मिलेगा  लिखेंगे............... नहीं मिलेगा तो जय जिनेन्द्र |
जैन दर्शन में गहरी रूचि..........  आध्यात्मिक  विचार मंथन जो मेरे जीवन का एक अभिन्न अंग बन गए है  इन अनुभूतियों में स्पष्ट झलकेंगे  ऐसा मेरा मानना है | क्योंकि जिस और हमारी रूचि होती है उसी और हमारा ध्यान जाता है चिंतन भी उसी और चलता रहता है | 
पहले पारिवारिक धार्मिक पृष्ठभूमि होने से देवदर्शन पूजा भक्ति इत्यादि कार्य मेरे नित्य कर्म में शामिल रहे  परन्तु आध्यात्मिक चर्चा वार्ता से हमारे परिवार का कोई विशेष सरोकार नहीं था केवल मेरे मामा पक्ष से कुछ जानकारिया सीख मुझे और मेरे परिवार को मिला करती थी | पहले  मै और मेरा परिवार पूज्य गुरुदेव श्री के प्रबल विरोधियो में से एक थे  परन्तु उस अज्ञान दशा पर अब उस सोंच पर पछतावा होता है | सही बात से अनभिज्ञ होने से और अफवाहों , गलत सलत  तथ्यों पर विश्वास करने के कारण मै बहुत दिनों तक सही तत्त्व ज्ञान से दूर रहा  |