Sunday, January 15, 2012

हम जब घर में खाना खा रहे होते है तो हम घर में होटल जैसा स्वाद और सर्व करने का  तरीका प्राप्त करने का प्रयास करते है और जब होटल में खाना खाना हो तो इसी होटल ढूंढते है जहा घर जैसा खाना और घर जैसी साफ़ सफाई रहती हो .............. दोनों ही परिस्थितियों का एक जगह पर सुमेल होना लगभग असंभव है ! क्योंकि घर में होटल जैसी ओपचारिकता नहीं हो सकती है और होटल में घर की गृहिणी के हाथो की मिठास खाने नहीं हो सकती है ! दोनों को मिलाने के अंतर्द्वंद में हम खाने का सही स्वाद न यहाँ ले पाते है  न वहा ..........  
हा एक बात जरूर है की यदि हम होटल में जहा खाना बन रहा होता है वह जगह जाकर देख कर खाना खाने बैठे और हमारे अन्दर जरा सी भी सम्वेंदन शीलता होगी तो होटल में खाना तुरंत छोड़ देंगे........... 

Tuesday, January 10, 2012

ये महा महोत्सव पंचकल्याणक आया मंगलकारी..............


ये महा महोत्सव पंचकल्याणक आया मंगलकारी..............
ये महा महोत्सव ...................................


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ये महा महोत्सव पंचकल्याणक आया मंगलकारी..............
ये महा महोत्सव ...................................

है धन्य धन्य वे कहान गुरु जिनवर महिमा बतलाते है
वे रंग राग से भिन्न  चिदातम का संगीत सुनाते है
है भव्य जीव आयो सब जन ......... अब मोह भाव का त्याग करो ........
यह पंचकल्याणक उत्सव कर .........अब आतम का कल्याण करो........
ये महा महोत्सव पंचकल्याणक आया मंगलकारी..............
ये महा महोत्सव ...................................

Friday, January 6, 2012

""एक बार वन्दे जो कोई ! ताहि नरक पशु गति नहीं होई!! "

""एक बार वन्दे जो कोई !
 ताहि नरक पशु गति नहीं होई!! "
तीर्थराज सम्मेद शिखर की महिमा को मंडित करने वाला घ्यानत राय जी का यह छंद तीर्थराज की  वंदना के फल को व्यक्त करता है की  तीर्थराज की एक बार भाव सहित वंदना करने से नरक और पशु गति का नवीन आयु  बंध  नहीं होता है | दुर्गतियो में नहीं जाना पड़ता है | यद्यपि  भाव सहित वंदना होने पर ही वंदना की सार्थकता  सफलता निहित है !
परन्तु एक परम तीर्थ .......... तीर्थो का राजा ..........तीर्थो का निर्माता  है जिसकी एक बार यदि वंदना कर ली तो नरक और पशु गति तो क्या गतियो का कुचक्र से छुटकारा मिल सकता है ! वह तीर्थ राज तीर्थ शिरोमणि है निज भगवान आत्मा जिसकी एक बार करी गयी वंदना भव  भव का जन्म मरण का विनाश कर देती है ! एक बार करी गयी वंदना अर्थात  सम्यक्दर्शन जो परिपूर्ण दशा प्राप्त करने की प्रथम सीढ़ी है ! ऐसे तीर्थ शिरोमणि तीर्थ राज की वंदना स्वयं को तीर्थस्वरूप बना देती है |



Wednesday, January 4, 2012

मेरी अनुभूतियाँ

अपने जीवन के खट्टे मीठे अनुभवों को इन्टरनेट के इस जाल प् र सुरक्षित करने के मन से यहाँ ब्लोगिंग की शुरुआत कर रहा हु | वेसे में अपने काम के काम  में एकदम panctual  नहीं हूँ फिर भी यहाँ कौन देखने आ रहा है | जब टाइम मिलेगा  लिखेंगे............... नहीं मिलेगा तो जय जिनेन्द्र |
जैन दर्शन में गहरी रूचि..........  आध्यात्मिक  विचार मंथन जो मेरे जीवन का एक अभिन्न अंग बन गए है  इन अनुभूतियों में स्पष्ट झलकेंगे  ऐसा मेरा मानना है | क्योंकि जिस और हमारी रूचि होती है उसी और हमारा ध्यान जाता है चिंतन भी उसी और चलता रहता है | 
पहले पारिवारिक धार्मिक पृष्ठभूमि होने से देवदर्शन पूजा भक्ति इत्यादि कार्य मेरे नित्य कर्म में शामिल रहे  परन्तु आध्यात्मिक चर्चा वार्ता से हमारे परिवार का कोई विशेष सरोकार नहीं था केवल मेरे मामा पक्ष से कुछ जानकारिया सीख मुझे और मेरे परिवार को मिला करती थी | पहले  मै और मेरा परिवार पूज्य गुरुदेव श्री के प्रबल विरोधियो में से एक थे  परन्तु उस अज्ञान दशा पर अब उस सोंच पर पछतावा होता है | सही बात से अनभिज्ञ होने से और अफवाहों , गलत सलत  तथ्यों पर विश्वास करने के कारण मै बहुत दिनों तक सही तत्त्व ज्ञान से दूर रहा  |