""एक बार वन्दे जो कोई !
ताहि नरक पशु गति नहीं होई!! "
तीर्थराज सम्मेद शिखर की महिमा को मंडित करने वाला घ्यानत राय जी का यह छंद तीर्थराज की वंदना के फल को व्यक्त करता है की तीर्थराज की एक बार भाव सहित वंदना करने से नरक और पशु गति का नवीन आयु बंध नहीं होता है | दुर्गतियो में नहीं जाना पड़ता है | यद्यपि भाव सहित वंदना होने पर ही वंदना की सार्थकता सफलता निहित है !
परन्तु एक परम तीर्थ .......... तीर्थो का राजा ..........तीर्थो का निर्माता है जिसकी एक बार यदि वंदना कर ली तो नरक और पशु गति तो क्या गतियो का कुचक्र से छुटकारा मिल सकता है ! वह तीर्थ राज तीर्थ शिरोमणि है निज भगवान आत्मा जिसकी एक बार करी गयी वंदना भव भव का जन्म मरण का विनाश कर देती है ! एक बार करी गयी वंदना अर्थात सम्यक्दर्शन जो परिपूर्ण दशा प्राप्त करने की प्रथम सीढ़ी है ! ऐसे तीर्थ शिरोमणि तीर्थ राज की वंदना स्वयं को तीर्थस्वरूप बना देती है |
ताहि नरक पशु गति नहीं होई!! "
तीर्थराज सम्मेद शिखर की महिमा को मंडित करने वाला घ्यानत राय जी का यह छंद तीर्थराज की वंदना के फल को व्यक्त करता है की तीर्थराज की एक बार भाव सहित वंदना करने से नरक और पशु गति का नवीन आयु बंध नहीं होता है | दुर्गतियो में नहीं जाना पड़ता है | यद्यपि भाव सहित वंदना होने पर ही वंदना की सार्थकता सफलता निहित है !
परन्तु एक परम तीर्थ .......... तीर्थो का राजा ..........तीर्थो का निर्माता है जिसकी एक बार यदि वंदना कर ली तो नरक और पशु गति तो क्या गतियो का कुचक्र से छुटकारा मिल सकता है ! वह तीर्थ राज तीर्थ शिरोमणि है निज भगवान आत्मा जिसकी एक बार करी गयी वंदना भव भव का जन्म मरण का विनाश कर देती है ! एक बार करी गयी वंदना अर्थात सम्यक्दर्शन जो परिपूर्ण दशा प्राप्त करने की प्रथम सीढ़ी है ! ऐसे तीर्थ शिरोमणि तीर्थ राज की वंदना स्वयं को तीर्थस्वरूप बना देती है |
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